भारत की संसद ने वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 पारित किया है, जिसे सरकार ने "ऐतिहासिक सुधार" बताया है, जबकि विपक्षी दलों ने इसे "असंवैधानिक" करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की घोषणा की है।
यह संशोधन मुस्लिम धर्मार्थ संपत्तियों, जिन्हें वक्फ कहा जाता है, के प्रबंधन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाता है। विधेयक के अनुसार, अब वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल किया जाएगा और सरकार को विवादित वक्फ संपत्तियों के स्वामित्व पर निर्णय लेने का अधिकार मिलेगा।
सरकार का पक्ष: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार का दावा है कि यह विधेयक वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और विविधता लाने के लिए आवश्यक है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि इस कदम से भ्रष्टाचार कम होगा और संपत्तियों का बेहतर प्रबंधन संभव होगा।
विपक्ष की प्रतिक्रिया: कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, राजद, आप, शिवसेना (यूबीटी), सपा और वाम दलों सहित विपक्षी पार्टियों ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया है। उनका आरोप है कि यह विधेयक मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाता है और असंवैधानिक है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी जल्द ही इस विधेयक की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे प्रमुख मुस्लिम संगठन इस विधेयक को इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ मानते हैं। उनका कहना है कि वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन केवल मुस्लिम समुदाय द्वारा ही किया जाना चाहिए और सरकार का इसमें हस्तक्षेप अनुचित है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय: कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह विधेयक पारदर्शिता और सुशासन को बढ़ावा दे सकता है, जबकि अन्य इसे धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन मानते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता शाहरुख अली का कहना है कि वक्फ निकायों की निगरानी को मजबूत करना सही दिशा में कदम है।
विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों ने इस विधेयक के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने का संकल्प लिया है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण होगी, जो देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और अल्पसंख्यक अधिकारों पर प्रभाव डाल सकती है।